कुछ बातें आदिवासियों के बारे में
आदिवासी पक्ष और समय
पुस्तक का एक अंश
आदिवासी पक्ष और समय
कुछ बातें आदिवासियों के बारे में
जो धरोहर है मनोहर है का भाव लिए मैं सोनभद्र वापस हुआ था, और जिसे अपना कहा जा सकता है, यहां सारा कुछ अपने जैसा था, रोजी थी, रोटी थी तथा उत्तराधिकार का उपहार भी था। मुझे क्या पता था कि जो कुछ मेरे पास है या जिसे मुझे भोगने की आजादी है, वही सारी चीजें मुझे घूरने लगेंगी, मुझसे सवाल दर सवाल पूझने लगेंगी और मैं मानव समीपता के कटघरे में खड़ा हो कर अपना ही विपक्ष बन जाऊंगा। खुद को अपने में गोते लगाने वाली दुनिया का नागरिक बना कर, खुद को आत्मभोगी प्रवृत्तियों से जोड़ लूंगा, जिसे मानव सभ्यता के लिए कलंक माना जाना चाहिए, जो जाने कैसे प्रशांसित हो रहा है।
मुझे क्या पता था कि गांधी का ‘हिन्द स्वराज्य’ मुझे ऐसा गढ़ेगा कि वकालत छोड़ने का फैसला मैं ले लूंगा। सीमित साधनों में ही जीवन जीने के सच की तलाश करने लगूंगा। तलाश तो तलाश ही होती है, वह कभी बांए की ओर झुकी होती है तो कभी दांए की ओर। वैसे मुझे यह जो बांया दंाया है, कभी पसंद नहीं आया। मुझे लगता है कि कहीं न बांया है और न ही दंाया, जो है वह सिर्फ और सिर्फ आदमी होने तथा उसे प्रमाणित करने का काम ही है, जो सीधे तौर पर अपनी खुद की आज़ादी की हिफाजत भी है वकालत के सात-आठ वर्षीय अनुभव मुझे चिढ़ाने लगे और लगातार सवाल पूछने लगे कि यह जो तुम वकालत कर रहे हो, मालूम है क्या कर रहे हो? शायद तुम्हें पता नहीं तुम उन्हीं कानूनों के जरिए लोगों की समस्याओं का समाधान तलाश रहे हो जो अंग्रेजों ने बनाए थे, तुम तो अंग्रेजी का विरोध किया करते हो, अपनी भाषा तथा संस्कृति की पैरवी किया करते हो। शायद तुम्हें नहीं मालूम कि तुम कर क्या रहे हो? अदालत, तथा यहां आने वाले लोगों के बारे में क्या तुमने विचारा? कौन हैं ये लोग जो अदालत के चक्कर काट रहे हैं, क्या इनकी समस्याओं का, इनकी गरीबी का, इनके शोषण का समाधान निकाल पाना अदालतों की क्षमता के भीतर है? भले ही तुम हर बार लिखते रहो कि श्रीमन् यह मामला आपके क्षेत्राधिकार में है।
आठ-दस साल ही गुजरे होंगे कि मेरी समझ में बात आने लगी और मेरी आत्मा अदालत से लगातार दूर भागने लगी, मुझे जान पड़ने लगा कि अदालत में अदालती कार्यभारों का निर्वहन करते हुए अपनी आजादी बचा पाना संभव नहीं, सो यह जो कानून, धर्म, परंपराओं आदि के बाहर की दुनिया है उस ओर जाना चाहिए। फिर तो जीवन जीने का एक ही रास्ता था कि सोनभद्र को ही पढ़ने की कोशिश करते हुए, अपनी जड़ों को पहचाना जाये, जिससे मैं काफी अनजान था।
सोनभद्र को जान लेना आसान नहीं था, जितना जानो उतना ही बाकी रह जाता है। सोनभद्र को जानने के लिए मेरे पास केवल तीन आधार थे, संपत्ति, भूमि और नारी। संपत्ति और भूमि-धारिता के मामलों ने मुझे आदिवासियों की भूमिहीनता के साथ जोड़ दिया और उत्तराधिकार ने मुझे अतीत के धोखों तथा वादाखिलाफियों से। मुझे पता ही नहीं चला कि मैं खुद आदिवासी कैसे बनता जा रहा हूॅ शायद इसका कारण आदिवासियों की संस्कृति की ईमानदार और सहभागी ऊर्जा हो। यह भी संभव है कि आदिवासियों के आस पास छितराई वे कहानियां हों जो किसी भी मानव समूह को शिष्टऔर सभ्य बना सकती हैं। आदिवासियों को गहरे से हर जानने वाले को पता है कि उनके यहां कहानियां और उपन्यास अपने आप जनम जाया करते हैं, उन्हें जनमाना या उगाना नहीं पड़ता है। वही हुआ ‘हरियल की लकड़ी’ वाली बसमतिया, ‘सहपुरवा’ वाली सुमिरिनी, ‘तीसरा रास्ता’ वाली ‘अस्मिता’ मुझे आदिवासी समूहों के बीच ही मिलीं और वे अपने आप मेरे उपन्यासों की प्रतिनिधि चरित्रा बन गईं। वे समय से ही नहीं समाज तथा व्यवस्था से टकराती हैं, खुद को अपनी आज़ादी के लिए गढ़ती हैं।
प्रस्तुत पुस्तक के सभी आलेख जिसमें कहीं ंन्यायशास्त्रा तो कहीं स्वामित्व के मिथक तथा उससे जुड़े छल-छद्म हैं तो कहीं कानून, सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, समता, समानता आदि के विमर्श भी हैं जो आदिवासियों की अस्मिता पर केन्द्रित हैं। मेरा प्रयास रहा है वही लिखूं जो देख रहा हूं, मेरे लेखन में आदिवासियों की रोटी की गंध हो तो उनकी रातें भी हो तथा उनका खुलापन तो हो ही। ऐसा करने में अपने आप सोनभद्र आता गया है, सोनभद्र केआदिवासी आते गये हैं, उनकी भ-धरिता तथा उससे जुड़ी समस्यायें आती गई हैं, मेरे लेखन में उनका आना मैं रोक भी नहीं सकता था। आदिवासियत की ऑच में तपते जाना तथा और तपते जाना, फिर मुझे भी अच्छा लगने लगा। यह बता देना गलत नहीं होगा कि ये लेख प्रायोजित नहीं है, हां इसमें ढेर सारे लेख ऐसे हैं जो पहले से ही स्तरीय पत्रिकाओं तथा संकलनों में प्रकाशित हो चुके हैं ऐसी स्थिति में उनमें दुहराव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, पर वे दुहराव विषय से ही संबधित होंगे, सो पाठक मुझे क्षमा करेंगे।
प्रस्तुत पुस्तक जो आपके हाथ में है जिसे आप पढ़ रहे हैं, आभारी हूं, मैं आभारी हूॅ उन आदिवासियों का जिनके साथ रह कर मैंने जाना कि जीवन जीने का असल मतलब क्या होता है, कोई व्यवस्था कैसे अव्यवस्था का रूप धर लेती है, कोई संस्कृति कैसे अपसंस्कृति में तब्दील हो जाती है और सभ्यता कैसे किसी गुफा में मुॅह छिपाने के लिए विवश हो जाती है। मैने देखा कि अतीत पर ऑसू बहाने के लिए आदिवासियों के पास न तो समय है और न ही अन्तराल जबकि उनका अतीत कम से कम सोनभद्र में तो बहुत पहले नहीं सिर्फ बारहवीं शताब्दी के पहले तक, फूलों के गुलदस्ते की तरह था, जगमग करता और सुगंध फैलाता। वे अपने अतीत के लिए चिन्तित नहीं हैं। वे मस्त हैं। उनकी मस्ती के पीछे, त्रास्त और मस्त होने के बीच करमा गीत-संगीत का धरोहर है, दिल को सदैव गुंजित रखने के लिए करमा के गीत हैं, मौसम की चंचलता है तो वनों की हरियायी मादकता भी है। इहलोक के कौतुकों को संवारने के लिए करम देवता हैं, और वहां नहीं है कुछ तो वह उनका अतीत है या भूत। उनके यहां कल भी अदब से आता है और जो कल गुजर चुका है उसे वे दफना चुके हैं। वे जानते हैं कि गुजरे हुए कल का पुनर्जन्म नहीं होना है। कल जो बीत गया या जो आने वाला कल है, दोनों मुर्दा हैं, जीवित केवल वर्तमान होता है। उसी में वे अपने उत्सवों को आयोजित करने के लिए विविध किस्म के रास्ते तलाश लेते हैं और प्रकृति की सहज उपलब्ध विविध कृतियों के कौतुकों में खुद को विलीन कर लेते हैं, शायद यही है उनके जीवन जीने के प्रति उत्साहित रहने का रहस्य।
आदिवासियों
के संग रहते
हुए ही मैं
जान पाया कि
वे क्यों ‘अइसन
जनम जग छोड़ि
के पहाड़े डेरा
हो’ का करमा गीत
गाते हैं और
अतीत को ऐसा
भूल जाते हैं
जैसे अतीत की
बातें उनके लिए
कूड़े से कुछ
अधिक न हो।
वैसे तो अतीत
के अधिकतर
किस्से कूड़े ही
होते हैं जिन्हें
चुन चुन कर
इतिहास के पन्नों
पर दर्ज किया
जाता है। आदिवासियों
को भले ही
असभ्य कहा जाता
हो पर यह
सच नहीं जान
पड़ता, अगर वे
असभ्य हैं तो
कोई भी ऐसा
मानव समूह नहीं
है जो सभ्य
है, सभी निष्श्चितरूप
से असभ्य हैं।
अगर आदिवासी असभ्य
होते तो अपने
जीवन को कभी
भी आइने की
तरह खुला नहीं
छोड़ते, आप चाहो
तो आदिवासियों की
सरलता, ईमानदारी, खुलापन तथा
उनकी काव्यमय प्रवृत्तियों
के आइने में
अपना चेहरा देख
लो। भाई-चारे
का सवाल हो
या सहयोग का,
दुख, सुख में
भागीदारी का सवाल
हो या एक
दूसरे पर समर्पित
होने का, अपने
देवी देवताओं के
प्रति आस्था की
बातें तो उनके
यहां सबसे अधिक
उल्लेखनीय हैं, वे
अपने देवी देवताओं
को अविश्वास के
कटघरों में नहीं
खड़ा करते। देवी
देवताओं की पूजा
आराधना के लिए
वे प्रकृति से
ही प्रसाद जैसी
सामग्रियों को संग्रहीत
करते हैं जैसे
करम की पूजा
के लिए करम
के पौधे की
लकड़ी, करम की
पत्तियां और कुइयां
के फूल आदि।
आदिवासियों के परिवारों में रह कर ही जाना जा सकता है कि उनके यहां नारियां किस तरह से सम्मानित हैं, उनके यहां नर-नारी के रिश्तों में जो सखी व सखा का भाव है, वह किसी प्रेम-कविता का वर्णन नहीं, न ही किसी प्रेम कहानी की भूमिका ही है, वह एक सचाई है जो आदरणीय है। साफ कहना चाहूंगा कि नारी, आदिवासियों के यहां कोई नारा नहीं है और नही पोस्टर, जिस पर जब चाहा कोई कविता या विधेयक लिख लिया। वहां आपको कुछ भी नहीं लिखना है। वहां तो नारी का जो स्त्रौण चित्त होता है उस पर प्रकृति ने अपने हाथों से पहले से ही सखी, सखा वाला भाव लिखा हुआ है, सिर्फ आपको प्रकृति का लिखा, पढ़ा, पढ़ना है। पर कैसे पढ़ेंगे आप प्रकृति का लिखा हुआ? उसे पढ़ने के लिए आप को प्रकृतिमय होना पड़ेगा, प्रकृति की लिपि और भाषा को अपने ज्ञान पर चिपकाना होगा। प्रकृति को तो वही समझ सकता है जो प्रकृति को अपना प्रतिरूप समझता हो तभी तो उनके यहां न भूमि का झगड़ा है और न ही संपत्ति का। आदिवासियों के बीच भूमि का जो प्रबंधन था वह था हर बालिग के लिए कम से कम एक हल की जोत की भमि प्रदान करना था इससे कम न अधिक। सो उनके समाज में कोई बेरोजगार नहीं होता था, सभी को रोजगार मिल जाया करता था। आदिवासियों के समाज में यह जो भूमि है कभी भी विवाद का विषय नहीं थी, भूमि तो उनके यहां पूजा का विषय थी मार-काट कतल की नहीं। तुलना कर लीजिए आदिवासियों के कुदरती यानि बिना किताबों वाली भूमि-प्रबंधन तकनीक आज के समय की किताबों वाली भूमि प्रबंधन की तकनीक की और देख लें फर्क।
आदिवासी पक्ष और समय पुस्तक आपके हाथ में है, देखें और मेरी कोशिश के बारे में सुझांए जिससे मैं आने वाले समय में कुछ बेहतर कर सकूं। आशा है कि आप निश्चिरूप से मुझसे एक कदम आगे चलेंगे जो आदिवासियों के साथ ही जुड़ना होगा, उनसे मन व चित्त का नाता बनाना होगा।

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