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अधिनियमो के आईने में आदिवासी

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  आदिवासी पक्ष और समय   रामनाथ शिवेंद्र  मनीष पब्लिकेशंस  ४७१/१०, A  ब्लॉक, पार्ट-२  सोनिया बिहार , दिल्ली -११००९४ फोन- ०९९६८७६२९५३ अधिनियमोें के आईने में आदिवासी जनजाति या आदिवासी दोनों न तो एक दूसरे के पूरक हैं और न ही पर्याय। आदिवासी का अर्थ मूल निवासी से ही लगाया जा सकता है, जबकि जनजाति में रहवास की मूल व्यवस्था का अर्थ किसी से छिपा नहीं है। जनजाति का अर्थ एक ऐसा वंशमूल या एक ऐसी प्रजाति जो सीधे तौर पर लोकसंस्कृति तथा लोककला व लोकविद्या से जुड़ी हुई हो, लगाया जा सकता है पर केवल ‘आदि’ या ‘मूल’ तथा रहवास से नहीं। आदिवासी का सीधा अर्थ है ऐसा जनसमूह जो आदिकाल से ही निवासी हो कहीं बाहर से आकर बसाहट न किया हो। जाहिर है, ‘जन’ को ‘अभिजन’ से पूर्णतः अलग कोटि में मान लेने की परंपरा विकसित हो चुकी है। विडम्बना देखें जब से इतिहास में आर्य तथा द्रविण का संघर्ष उभरा है, तब से यह सिद्ध नहीं हो पा रहा है कि यहां के मूल निवासी कौन थे? ‘वनआर्य’ जातियां या ‘द्रविणआर्य’ जातियां, किसे मूल निवासी माना जाये, यह आज भी विवादास्पद बना हुआ है। लगभग इसी झगड़े के प्...

कुछ बातें आदिवासियों के बारे में

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   आदिवासी पक्ष और समय   पुस्तक का एक अंश आदिवासी पक्ष और समय   रामनाथ शिवेंद्र  मनीष पब्लिकेशंस  ४७१/१०, A  ब्लॉक, पार्ट-२  सोनिया बिहार , दिल्ली -११००९४ फोन- ०९९६८७६२९५३     कुछ बातें आदिवासियों के बारे में   एक समय था जब हमारे जनपद सोनभद्र की चिमनियां मेरे लिए किसी कौतुक से कम नहीं थीं , उनकी ऊचाइयों में मैं काफी गहरे तक डूब जाया करता था और लगता था कि मेरा कद चिमनियों माफिक काफी ऊंचा हो गया है। पढ़ाई खतम और रोजी रोटी की लड़ाई शुरू , इस लड़ाई में चिमनियों का बौना - पन समय के साथ दिखने लगा फिर तो मुझे अपने जनपद की ओर वापस होना ही था। क्या हमारा जनपद कारखानों के झुन्ड के कारण विकसित है ? इसे जान - समझ कर मैं बहुत ही चिन्तित रहने लगा आखिर विकास की   प्रतीक कथित चिमनियॉ मेरे जनपद के लोगों के बीच भूख और भोजन के बीच संतुलन क्यों नहीं स्थापित कर पा रही हैं ? कहीं न कहीं कोई न कोई आर्थिक प्रपंच है जिसे ...